

माँ महालक्ष्मी धन, ऐश्वर्य, वैभव, सौभाग्य, समृद्धि एवं मंगल की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे भगवान श्रीहरि विष्णु की अर्धांगिनी हैं तथा संसार के समस्त जीवों को धन, धान्य, सुख, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करती हैं। श्रद्धा एवं भक्ति से लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से आर्थिक उन्नति, मानसिक शांति तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
मातू लक्ष्मी कारी कृपा,
हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध कारी,
परुवाहु मेरी आसो॥
यही मोर अरदास,
हाथ जोड़ विनती करूं।
सब विधि करौ सुवास,
जय जननि जगदंबिका॥
सिंधु सूता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान, बुद्धि, विद्या दो मोही॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी।
सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननी जगदम्बा।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
तुम ही हो सब घाट वासी।
विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिंधु कुमारी।
दिनों की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्या तुमाहिन महारानी।
कृपा करौ जग जननी भवानी॥
केही विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितावावो मम ओरि।
जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥
क्षीरसिंधु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिंधु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी।
सेवा कियो प्रभु बनी दासी॥
जब जब जन्म जहान प्रभु लिन्हा।
रूप बदल तहं सेवा किन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लिन्हे अवधापुरी अवतार॥
तब तुम प्रगट जनकपुर माहिं।
सेवा कियो हृदय पुलकाहिं॥
अपनाया तोहि अंतर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी।
कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करई सेवकाई।
मन इच्छा वांछित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई।
पूजहिं विविध भांति मन लाई॥
और हाल मैं कहूं बुझाई।
जो यह पाठ करई मन लाई॥
ताको कोई कष्ट न होई।
मन इच्छित पावै फल सोई॥
त्राहि त्राहि जय दुख निवारिणी।
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै।
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताको कोई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
पुत्रहीन अरु सम्पत्ति हीना।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं।
उन सम कोई जग में कहूं नाहीं॥
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा।
होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी।
सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी।
दर्शन दैजै दशा निहारी॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।
तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में।
सब जानत हो अपने मन में॥
रूप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।
ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी,
हरो वेगि सब त्रास॥
जयति जयति जय लक्ष्मी,
करो शत्रु को नाश॥
रामदास धारी ध्यान नित,
विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर,
करहु दया की कोर॥
श्री लक्ष्मी चालीसा माँ महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। श्रद्धा एवं विश्वास के साथ इसका नियमित पाठ करने से धन, वैभव, सौभाग्य, समृद्धि, सुख-शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। यह चालीसा न केवल आर्थिक उन्नति प्रदान करती है, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास और मानसिक शांति का भी संचार करती है।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं
कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः॥
हे माँ महालक्ष्मी!
मुझ पर अपनी असीम कृपा बनाए रखें।
मेरे घर में सदैव सुख, शांति,
समृद्धि एवं सद्बुद्धि का वास हो।
मेरे सभी कष्ट, दरिद्रता एवं विघ्नों का नाश करें
तथा मुझे सदैव धर्म, सत्य एवं सेवा के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।
॥ जय माँ महालक्ष्मी ॥
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे
विष्णुपत्न्यै च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्॥
🌺 श्री महालक्ष्मी माता की जय 🌺
जो श्रद्धा एवं विश्वास के साथ श्री लक्ष्मी चालीसा का नियमित पाठ करता है, उस पर माँ महालक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रहती है। उसके जीवन में सुख, समृद्धि, सौभाग्य तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः